Thursday, July 9, 2015

कुछ बनने की दौड़ में कितने अकेले रह गए हम ....



कुछ बनना है कुछ करना है ...इतनी आसानी से हम कह तो देते है शायद ही कभी किसी ने सोचा होगा की किसी मुकाम को हासिल केरते करते हम ऐसा बहुत कुछ पीछे छोड़ देते है जो शायद कभी हमारा साया हुआ करता था . ना चाहते हुए भी अपनी ज़िन्दगी में तौर तरीको के साथ साथ अपनी  ज़िन्दगी से लोगो को भी बदल डालते है.पर कभी कभी कुछ ऐसे लोगो का साथ भी मिल जाता है जो आपके जाने के बाद भी आपकी की कमी को महसूस करते है और कभी भूल से मिल जाने पर बस इतनी सी शिकायत करते है की ‘बहुत अकेले हो गए हम’ .हर किसी की ज़िन्दगी में कोई ऐसा साया जरूर होगा जिसको जाने अनजाने अपने नज़रअंदाज़ किया होगा और शायद कभी इस बात का इल्म भी न हुआ होगा आपको .ज़िन्दगी में आगे बढ़ो पर अपनों के साथ क्यूंकि हम एक दुसरे के साथ के बिना अधूरे है .....
# आप बीती #

Tuesday, April 7, 2015

"कफ़न"



कफ़न ....
यु तो हम इस सच से वाकिफ़ है की ज़िन्दगी जिसको  हम ऊपर वाले की देन समझते है उसे एक दिन ख़तम ही हो जाना है . “कफ़न” भी इसी सच का एक हिस्सा है पर सच से हमेशा ही हम इंसान डरते आए है .वैसे अगर “कफ़न” पर ध्यान दिया जाए तो ये हमेशा ही श्वेत रंग का ही होता है ,जिसको हम शोक का भी प्रतीक मानते है .ये श्वेत रंग का कफ़न वैसे तो हमेशा दुःख का ही संकेत माना जाता है पर जरा सोचिये जो इंसान किसी लम्बी बिमारी से ग्रस्त उसके लिए तो शायद ख़ुशी का प्रतीक हो .
वही अगर किसी की आकाश्मिक मौत हो जाए तो उस “कफ़न” के साथ ही साथ उसके सारे सपने और उमीदे भी दफन हो जाती है ...वैसे दिखने में तो “कफ़न” बस एक श्वेत कपडे का टुकड़ा है पर अगर उसके अस्तित्व पर जाए तो “कफ़न” वो चीज़ है जो एक इंसान के अस्तित्व को हमेशा हमेशा के लिए ख़तम कर देता है .जब कोइ शरीर “कफ़न” में लिपट जाता है तब ये समझ लेना चाहिए की अब बस ये सफर यही पर ख़तम हुआ  और अब अगर कुछ बचा है तो वो सिर्फ और सिर्फ उस इंसान की यादें ...बड़ी ही अजीब सी बात है जब इंसान के अन्दर साँसे होती है तब तक वो दुनिया के सारे रंगों को अपनी ज़िन्दगी में भरने में लगा रहता है पर जैसे ही साँसे साथ छोड़ देती है उसी के साथ ही ये रंग भी दूर हो जाते है .वैसे श्वेत रंग शोक के साथ साथ शांति का भी प्रतीक होता है शायद इसीलिए सफ़ेद रंग को ही “कफ़न” के लिए चुना गया होगा क्यूंकि जब तक इंसान जीवित रहता है तब तक उसकी ज़िन्दगी में एक पल की भी शान्ति नहीं रहती है इसीलिए शायद ज़िन्दगी ख़तम होने है पर शांति की जरुरत और अहमियत दोनों ही बढ़ जाती है. “कफ़न का नाम सुनते ही लोग खौफ  में आ जाते है पर शायद वो ये नहीं  जानते है की ये जीवन का बहुत बड़ा सत्य है और  एक ना एक दिन  इस सच से उसे रूबरू होना ही पड़ेगा  देखा जाए तो “कफ़न” हर किसी की मौत का साक्षी होता है फिर भी हम सभी अपनी रोजाना की ज़िन्दगी में इसका  नाम लेने से भी डरते है ....
पर जब बात शहीदों की आती है हमारे देश के लिए शहीद हो जाते  है उनके लिए तो  “कफ़न” एक फक्र की बात होती है .उनके लिए देश का तिरंगा ही “कफ़न” होता और वो हस्ते हस्ते इस “कफ़न” को स्वीकार करते है .पूरी ज़िन्दगी लोग पैसे कमाने के पीछे अपनी ज़िन्दगी की खुशिया तक खो  बैठते है पर ये तो सोचते ही नहीं की “कफ़न” जिसमे हम सब को जाना है उसमे तो कोई ‘पॉकेट’ भी नहीं होती तो ये सारे पैसे ले कैसे जाएँगे ?? ये सारे वो सच है जो हम जानते तो है पर स्वीकार नहीं कर पाते  है ....
कुछ के सारे सपने ख़तम होते है इस कफ़न से और कुछ को ऐसी ज़िन्दगी से आज़ादी मिलती है जिसमे वो रहना ही नहीं चाहते है . “ कफ़न” काम तो एक ही करता है पर अलग -अलग लोगो के लिए इसके अलग- अलग मायने होते है .पर हा एक बात अपने ज़हन में हमेशा रखे एक न एक दिन इस “कफ़न” से मुलाकात हर किसी की होनी है .
ज़िन्दगी की कश्मो-कश ये भूल न जाना ...
ये “कफ़न” किसी का नहीं ...
आज मेरा है तो कल तेरा होगा ....

               

Sunday, March 22, 2015

शर्मसार....


शर्मसार ...
जैसा की हम सभी जानते है की हालहि में बीबीसी द्वारा ‘निर्भया डाक्यूमेंट्री’ प्रकाशित की गई  है,इसी के चलते मैंने भी इस डाक्यूमेंट्री को देखा २ से ३ बार क्यूंकि मैं खुद ही अपने देश के लोगो की सोच पर संदेह और आश्चर्य हो रहा था .मैं ये तो नहीं कहूँगी की इस डाक्यूमेंट्री के माध्यम से हम देश की सोच को बदल सकते है ,पर इस प्रयास से हम लोगो की सोच के बारे में जरुर जान सकते है .एक लड़की जो सिर्फ २३ साल की थी जिसके पास एक उज्वल भविष्य था क्यूंकि वह एक मेडिकल की छात्र थी .वैसे तो वो अब ये सब पढने औए देखने के लिए नहीं है पर फिर भी एक सवाल अपने पीछे छोड़ गई ...की आखिर गलती थी क्या ??रात में ८;३० बजे बहार जाना ?या एक लड़के के साथ बहार जाना? या फिर एक लड़की होना ??इन सभी सवालो के बहुत लोगो ने अलग अलग जिनमे से कुछ बहुत ही शर्मनाक है जो की इस डाक्यूमेंट्री का हिस्सा भी है .केस के डिफेन्स लॉयर का कहना है की “फीमेल इस लाइक अ फ्लावर ,इफ फ्लावर इस इन  अ गटर इट विल स्पोइल्ट एंड इफ वी पुट फ्लावर इन अ टेम्पल इट विल worshipped” इसका तो यही तात्पर्य है की लडकियों को बस घर की चार दीवारों में रहना चाहिए अगर वो घर के बाहर निकली तो रेप होना बहुत ही ऑब्वियस है .ये है मेरे पढ़े लिखे समाज की सोच ..उधर ही आनन् फानन में वकील साहब ने ये बयान दे डाला की ‘वी हेव बेस्ट कल्चर एंड इन आवर कल्चर वी हेव नो प्लेस फॉर अ वुमन ’ इस स्टेटमेंट  न ही लडकियों पर बल्कि उनको अस्तित्व पर भी सवाल उठा डाला .आकड़ो की माने तो हमारे देश में हर २० मिनट  पर एक रेप होता है .उधर ही दूसरा पक्ष दोषी मुकेश का जो की २८ साल का है और पेशे से एक बस ड्राईवर है उसका तो ये कहना था की हम लोग बस उस लड़की और लड़के को सबक सिखाना चाहते थे .क्यूंकि अगर वो एक अच्छी लड़की होती तो रात के  ९ बजे अपने घर से बाहर न घूम रही होती और अगर उसने रेप के वक़्त अपने सेल्फ डिफेन्स में संघर्ष न करती तो सिर्फ रेप करने के बाद उसे जाने देते .इतना घिनौना काम करने के बाद भी वो अपनी ऐसी दलीले पेश कर रहा था और पछतावे का तो दूर –दूर तक कोई निशाँ नहीं था .मैंने सुना है की ये डाक्यूमेंट्री बैन कर दी गए है क्यूंकि ये देश की छवि को ख़राब कर रही थी .पर मेरा तो ये सोचना है की ये हमारे देश का सच है और सच अक्सर कड़वा होता है . जिम्मेदार कौन ??वो पढ़ा लिखा वर्ग जो बोल रहा है की लडकियों को ६ बजे के बाद बहार नहीं जाना चाहिए था या फिर वो शिक्षा या समाज से दूर है और उसका सोचना है की ‘girl should allow them to get raped’ ...
 व्हाट द डिफरेंस बिटवीन educated एंड uneducated सोसाइटी जहा वो एक ही निष्कर्ष निकाल रहे है की लडकियों को अपनी हदों में रहना चाहिए मेरा पूछना है की पुरुष वर्ग को उनकी हदे कौन बताएगा ??निष्कर्ष कुछ निकले या न निकले पहल तो होगी ही...सब कुछ सोच पर निर्भर करता है की आप कोई सीख लेते है या फिर से दुनिया के लिए सीख बनाना चाहते है .......
यहाँ पर सांस लेना भी मुश्किल है....
जहा हर पल एक खौफ है ....
आज किसी की ‘ज्योति ’थी ....
क्या पता कल ये गाथा भी हमारी हो ....

Tuesday, March 17, 2015

अगर तुम न होते .....


अगर तुम न होते ......
ये चाहते ,ये रौनके  न होती ...   
अगर तुम न होते ...
ज़िन्दगी तो थी पर जी न पाते ...
अगर तुम न होते ...
तुझे पाने की कोशिश तो न की  ,पर सब कुछ खो बैठते ...
अगर तुम न होते ...
जख्म तो आज भी है ,पर इन्हें भूल न पाते ...
अगर तुम न होते ...
दुनिया क लिए भले ही तू एक कतरा है ,पर मेरी तो दुनिया ही अधूरी होती ...
अगर तुम न होते ...
दुनिया ने दर्द तो बहुत दिया , पर कभी बयान न कर पाते ...                       
अगर तुम न होते ...
साथ निभाने का वादा तो बहुतो ने किया पर मुझे इल्म था वो साथ नहीं फरेब होता ...
अगर तुम न होते ...
ज़िन्दगी ने सब कुछ दिया पर किसी को खोने का डर न होता ...
अगर तुम न होते ..
तूने मेरे दर्द को समझा ,जों इस सीने में दफ़न था ...
नहीं तो जीत हार क इस खेल में दर्द जीत जाता अगर तुम न होते ...
अगर तुम न होते ...

एक विचार ऐसा भी ...

एक वचार ऐसा भी.....

ढलते हुए सूरज को कोई सलाम नहीं करता ,पर सुबह का इंतज़ार सबको होता है ...लोग भूल जाते है की ये सुबह भी वो ढलता हुआ सूरज ही लाएगा..तो कब किसका सूरज ढल जाए ??और कब सुबह की  तरह किसके  जीवन में रोशिनी आ जाए इसका पता किसको है ..आज यहाँ है कल कहीं और होंगे ये तो पता है पर क्या होंगे ये नि पता ...इसीलिए किसी की शोहरत के पीछे मत भागो भागना है तो अपने सपनो के पीछे भागो ...क्यूंकि वही सपना एक दिन शोहरत बनकर आपके कदमो में आ गिरेगी ....

तब ढलता हुआ सूरज सुबह बन जाएगा और गौर फरमाइयेगा तब निश्चित रूप से उस सुबह को  लोग सलाम करेंगे ....

पर ध्यान रखना वो सलाम इज्ज़त से होना चाहिए डर से नहीं ....क्यूंकि डर और इज्ज़त दोनों से शोहरत के माइने बदल जाएँगे ....

Monday, February 16, 2015

तेरी याद ......

जब तू था तब कभी महसूस न हुआ की तेरे जाने से क्या होगा ??

तेरी शैतानी हम सब को सताती थी पर अब बस तेरी याद है .....

कभी सोचा न था कि ज़िन्दगी के किसी मुकाम पर बस तेरी तस्वीर रह जाएगी हाथों में ....

तेरे जाने का दर्द आज भी "माँ " की आँखों में दिखाई देता है .....

मुझे यकीन है की अब तू वापस कभी नहीं आएगा पर आज भी हर ' राखी ' पर तेरा इंतज़ार रहता है ....

अगर पता होता तेरा मेरा साथ बस इतना ही था तो कभी तुझे रुलाती ना .. कभी तुझे सताती ना....

बस एक ख्वाइश है मेरी तुझे एक बार देख लू तुझसे पूछ लूँही कि तू कैसा है ???

एक सवाल और मेरा.. तुझे कभी हमारी याद नहीं आती ??

शायद वो लोग तुझे ज्यादा प्यार करते होंगे ...

पर " माँ " आज भी तुझे उतना ही प्यार करती है जितना वो हमसे करती है या शायद उससे भी ज्यादा .....

तुझे जाना ही था तो तू आया ही क्यूँ ???

Friday, February 13, 2015

मेरी शिकायत मेरे देश से। 

यू तो मैं ऐसे देश की लड़की हू जो " भारत माता " के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है।  पर वो कहते है ना "व्हाट इज़ दियर इन नेम" क्युकी हमारे देश में हर दिन , हर पल लगभग हर लड़की को ये एहसास दिलाया जाता है की वह एक लड़की है।  हमारा ही एक ऐसा देश है जहा रेप विक्टिम को ऐसे देखा जाता है जैसे पता नई उसने कितना बड़ा गुनाह किया हो।  सोचने वाली बात है कि दामिनी रेप केस जैसे जघन्य  अपराध में भी लोग ऐसे सवाल उठाते है कि वो इतनी रात को अपने बॉयफ्रेंड के साथ क्या कर रही थी ?? मैं ऐसे  देश में हु जहा " "वूमेन  एम्पावरमेंट" पर सेमिनार तो होते है पर सोच कभी उस सेमिनार की चार दीवारो से बाहर नहीं आ पाती।  क्या होगा देश की उन लड़कियों का जिनको उनके घर वाले ही कमजोर बना रहे है।  अक्सर लोगो को कहते हुए सुना है "डोंट बिहेव लाइक एनिमल्स " पर मै   तो ये कहती हु कि बिहेव लाइक एनिमल्स बिकॉज़ इवन दे आल्सो डोंट डिस्क्रिमिनेट ऑन द बेसिस ऑफ़ दियर जेंडर।  जब भी कोई सेक्सुअल हरैसमेंट  का केस सामने आता है तब लोगो को ड्रेसिंग सेंस के बारे में बात करते सुना है इसी बात पर एक बात मेरे ज़ेहन में आती है कि उस लड़की की क्या गलती होगी जो अभी 5 साल की भी नहीं हुई और रेप जैसे   अपराध का शिकार हो गई।  इससे यह सवाल सामने आता है की , उसकी भी क्या  कोई  ड्रेसिंग प्रॉब्लम  थी  ? जिसकी वजह  से उसके साथ ऐसा हुआ ??  मेरी जैसी देश की हर लड़की की  यही शिकायत होगी की वो कैसे सर्वाइव करे जहा हर वक़्त एक दर सा हमारे अंदर है की पता नई कल कौन सी परेशानी का सामना करना पड़ेगा।  वैसे एसिड अटैक  का  भी  ट्रेंड देश में बहुत जोरो शोरो से है। एक सवाल  लड़को से "की भाई लोगो क्या एसिड डालने से वो लड़की आपसे प्यार करने लगेगी "  प्रपोसल एक्सेप्ट लेगी ?? जो की एक बहुत की कॉमन रीज़न है एसिड अटैक का क्यूंकि लड़को को रिजेक्शन मिलने क बाद अक्सर कहते हुए सुना है " की यार ईगो हर्ट हो गया है " मेरे भाइयो इतनी फ्रीडम तो दे दो की हम अपनी पसंद  और नापसंद का फैसला हम खुद कर   सके।   कितने हादसे मेरे देश में लड़कियों के साथ हुए होंगे जो आज भी उनके जेहेन में दफ़न होंगे  और कोई भी कोई ऐसी घटना सामने आती है तो उनको कहीं न कहीं अपनी कहानी नज़र आती होगी।  कितनी शर्म की बात है की हम  देश को बाहरी हमलो से तो बचा लेते है पर   अपने ही देश की बेटियो को नहीं बचा पाते।  गरीबी से ज्यादा बुरी हालत देश में लड़कियों की है हर एक दिन उनके लिए एक चुनौती  की तरह है।  यह सब देखने क बाद तो बस दिल से एक ही आवाज़ आती है की " न आना इस देश मेरी लाड़ो " और अगर आ गई  तो " ज़िन्दगी हर कदम एक नयी जंग है " मेरा सलाम देश की हर उस बेटी को जो यहाँ रहती और कहती है " भारत माता की जय " और सवाल मेरे देश से की आज़ादी मिले तो ६८  साल हो गए पर देश की लड़कियों को आज भी आज़ादी नहीं मिली।  देश की हर लड़की का बस अब एक ही सवाल है  हमारी भी आज़ादी के बारे में पार्लियामेंट  में कोई विचार विमर्श किया जाये।  
" बेख़ौफ़ आज़ाद है जीना हमे "
बेख़ौफ़ आज़ाद है रहना हमे "