एक वचार ऐसा भी.....
ढलते हुए सूरज को कोई सलाम नहीं करता ,पर सुबह का इंतज़ार सबको होता है ...लोग भूल जाते है की ये सुबह भी वो ढलता हुआ सूरज ही लाएगा..तो कब किसका सूरज ढल जाए ??और कब सुबह की तरह किसके जीवन में रोशिनी आ जाए इसका पता किसको है ..आज यहाँ है कल कहीं और होंगे ये तो पता है पर क्या होंगे ये नि पता ...इसीलिए किसी की शोहरत के पीछे मत भागो भागना है तो अपने सपनो के पीछे भागो ...क्यूंकि वही सपना एक दिन शोहरत बनकर आपके कदमो में आ गिरेगी ....
तब ढलता हुआ सूरज सुबह बन जाएगा और गौर फरमाइयेगा तब निश्चित रूप से उस सुबह को लोग सलाम करेंगे ....
पर ध्यान रखना वो सलाम इज्ज़त से होना चाहिए डर से नहीं ....क्यूंकि डर और इज्ज़त दोनों से शोहरत के माइने बदल जाएँगे ....
Wahh wahh ;)' (y)
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